बुलंदशहर, डेस्क (जय यात्रा): बुलंदशहर की अदालत में 34 साल पुराने एक मुकदमे का आखिरकार फैसला हो गया। यह मामला उस समय का है, जब मुकदमे के वादी खुद न्यायिक मजिस्ट्रेट थे और आरोपी पक्ष में तीन अधिवक्ताओं के नाम शामिल थे। लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद अदालत ने साक्ष्यों के अभाव में दो आरोपी अधिवक्ताओं को बरी कर दिया, जबकि तीसरे आरोपी की फैसला आने से पहले ही मौत हो चुकी है। मामला 24 जून 1992 का है। खुर्जा न्यायालय में तैनात तत्कालीन मुंसिफ अशोक कुमार वर्मा ने खुर्जा नगर थाने में शिकायत दर्ज कराई थी। आरोप था कि तीन अधिवक्ताओं ने अदालत कक्ष में पहुंचकर अभद्रता की, पत्रावली फाड़ी और चैंबर में जाकर मारपीट के साथ जान से मारने की धमकी दी।
मामले में वर्ष 2004 में आरोप तय किए गए, लेकिन इसके बाद मुकदमे की सुनवाई गवाही के इंतजार में लंबे समय तक चलती रही। करीब 34 साल की इस कानूनी प्रक्रिया के दौरान अभियोजन पक्ष अदालत के सामने केवल एक गवाह पेश कर सका। खास बात यह रही कि वह गवाह भी बाद में अपने बयान से मुकर गया।
अदालत ने अभियोजन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाते हुए 17 सितंबर 2026 को डीएम, एसएसपी और संयुक्त निदेशक अभियोजन को पत्र भेजकर सख्त रुख अपनाया था। इसके बावजूद मामले में पर्याप्त साक्ष्य अदालत के सामने नहीं आ सके। अपर सिविल जज, अवर खंड, मोनिका कालरा की अदालत ने साक्ष्यों के अभाव और संदेह का लाभ देते हुए प्रेमशंकर चौहान और वेदपाल राघव को बाइज्जत बरी कर दिया। वहीं तीसरे आरोपी विजय राघव की फैसला आने से पहले ही मृत्यु हो चुकी थी। 34 साल तक चले इस मुकदमे ने न्यायिक और अभियोजन व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। एक तरफ शिकायतकर्ता न्यायिक अधिकारी को फैसले के लिए दशकों तक इंतजार करना पड़ा, तो दूसरी तरफ आरोपियों को भी वर्षों तक मुकदमे का सामना करना पड़ा। यह मामला लंबित मुकदमों में समय पर गवाही और प्रभावी अभियोजन की जरूरत को एक बार फिर सामने लाता है।
34 साल बाद आया फैसला, दो अधिवक्ता बरी
RELATED ARTICLES


